गदरपुर विधायक अरविन्द पांडेय से किनारा करेगी भाजपा ?
गदरपुर। गदरपुर से भाजपा विधायक अरविन्द पांडेय और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बीच चला आ रहा तनाव अब खुलकर सियासी संकट का रूप लेता दिख
प्रदीप फुटेला
गदरपुर। गदरपुर से भाजपा विधायक अरविन्द पांडेय और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बीच चला आ रहा तनाव अब खुलकर सियासी संकट का रूप लेता दिख रहा है। पार्टी के भीतर यह चर्चा आम है कि यह टकराव अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी नींव उसी समय पड़ गई थी जब अरविन्द पांडेय को धामी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।
बताया जाता है कि मंत्री पद से वंचित रहने के बाद पांडेय खुलकर असंतुष्ट हो गए थे। इसी दौर में उन पर यह गंभीर आरोप भी लगे कि उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को चुनाव में हरवाने के लिए कथित तौर पर अंदरखाने साजिश रची थी। इन आरोपों के बाद धामी और पांडेय के रिश्तों में और कड़वाहट आ गई। पार्टी के भीतर यह संदेश चला गया कि पांडेय मुख्यमंत्री की “गुड बुक” में नहीं हैं।
सूत्रों के मुताबिक, तभी से विधायक अरविन्द पांडेय को राजनीतिक रूप से साइड लाइन करने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर उन्हें हाशिये पर डालने की रणनीति पर काम होने लगा। हालांकि, राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले पांडेय ने चुप बैठने के बजाय सरकार को असहज करने का रास्ता चुना। वे लगातार तीखे व्यंग्यबाणों के जरिए सरकार और व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे, जिससे पार्टी नेतृत्व की परेशानी और बढ़ती चली गई।
मामला उस वक्त और गंभीर हो गया जब प्रशासन ने विधायक अरविन्द पांडेय के आवास पर अवैध अतिक्रमण को लेकर नोटिस चस्पा कर दिया। इस कार्रवाई को पांडेय समर्थकों ने राजनीतिक बदले की भावना से जोड़कर देखा। गदरपुर में यह संदेश तेजी से फैला कि प्रशासनिक कार्रवाई के पीछे राजनीतिक दबाव काम कर रहा है।
इस नोटिस के बाद भाजपा की अंदरूनी राजनीति में हलचल तेज हो गई। धामी विरोधी लॉबी से जुड़े कई दिग्गज नेताओं—पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी, विधायक विशन सिंह चुफाल, विधायक मदन कौशिक समेत अन्य नेताओं—ने अरविन्द पांडेय के आवास पर जाने का कार्यक्रम तय कर दिया। इसे पांडेय के समर्थन और सरकार के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा गया।
लेकिन जैसे ही यह कार्यक्रम सामने आया, पार्टी हाइकमान हरकत में आ गया। संगठन ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए इन सभी नेताओं को गदरपुर जाने से रोक दिया। माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व किसी भी सूरत में इस मुद्दे को खुली बगावत या शक्ति प्रदर्शन में बदलने नहीं देना चाहता था।
इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि गदरपुर का मामला अब केवल एक विधायक बनाम प्रशासन का नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा की आंतरिक राजनीति, गुटबाज़ी और नेतृत्व के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बन चुका है। सवाल यही है कि क्या पार्टी समय रहते इस आग को बुझा पाएगी, या फिर यह अंदरूनी टकराव आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा करेगा।
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