पांडेय प्रकरण ने बढ़ाई सियासी तपिश, भाजपा में खुला गुटीय संघर्ष
गदरपुर/देहरादून। गदरपुर विधायक अरविन्द पांडेय से जुड़ा विवाद अब स्थानीय राजनीति से निकलकर प्रदेश और केंद्र तक पहुंच गया है।
गदरपुर/देहरादून। गदरपुर विधायक अरविन्द पांडेय से जुड़ा विवाद अब स्थानीय राजनीति से निकलकर प्रदेश और केंद्र तक पहुंच गया है। प्रशासनिक कार्रवाई और ध्वस्तीकरण नोटिस के बाद भाजपा के भीतर मची उथल-पुथल गुरुवार को और गहराती दिखी, जब पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद अनिल बलूनी और वरिष्ठ विधायक बिशन सिंह चुफाल का पांडेय के आवास पर प्रस्तावित दौरा अंतिम समय में निरस्त हो गया।
बताया जा रहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कार्यक्रम के चलते यह दौरा रद्द हुआ, हालांकि राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी हाइकमान के दबाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दिलचस्प यह है कि दौरा निरस्त होने के बावजूद पांडेय के आवास पर सैकड़ों की संख्या में समर्थक पहले से मौजूद थे। समर्थकों में भारी नाराजगी और आक्रोश साफ नजर आया।
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया है। पार्टी अब स्पष्ट तौर पर दो गुटों में बंटी नजर आ रही है—एक वह, जो पांडेय की बेबाकी और अफसरशाही के खिलाफ उठाए गए सवालों को सही ठहराता है, और दूसरा वह, जो इसे संगठनात्मक अनुशासन के खिलाफ मानता है। पांडेय समर्थकों का आरोप है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने की सजा उन्हें दी जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक यह मामला अब केंद्र सरकार तक पहुंच चुका है। केंद्रीय स्तर पर उत्तराखंड भाजपा की स्थिति और अंदरूनी कलह को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व फिलहाल बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस विवाद की आंच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक भी पहुंचती दिख रही है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि यदि गुटीय संघर्ष यूं ही बढ़ता रहा, तो इसका सीधा असर सरकार की स्थिरता और नेतृत्व पर पड़ सकता है।
फिलहाल साफ है कि यह विवाद जल्द थमने वाला नहीं है। तराई से लेकर देहरादून और अब दिल्ली तक फैली इस सियासी आग ने भाजपा के लिए एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। आने वाले दिन तय करेंगे कि पार्टी इसे भीतरखाने सुलझा पाती है या यह टकराव और बड़े राजनीतिक भूचाल की शक्ल लेता है।
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